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सबूत* लँका से वापस आकर हनुमानजी प्रभु श्रीराम से कह रहे थे-

सबूत*

लँका से वापस आकर हनुमानजी प्रभु श्रीराम से कह रहे थे-
*"प्रभु! मैं लंका जला कर आ रहा हूँ।"
प्रभु कुछ कहते उसके पहले ही कुछ दिशाहीन उछलू बन्दरोँ ने पूछा-
*"हनुमान! तुम जलाने का कोई सामान तो ले नहीं गए थे, फिर लंका जलाई कैसे?"*

हनुमानजी ने कहा-

*" तेल और घी भी उनका था, कपडे़ भी उनके थे, माचिस भी उनकी थी और मैंने लँका जलाई भी उनकी।"*

दिशाहीन उछलू बन्दरों ने पुनः पूछा-

*"
कोई प्रमाण है तुम्हारे पास कि तुमने वास्तव में लंका जलाई? बिना सबूत के हम कैसे मान लें कि तुमने लंका जलाई।"*
जामवन्त ने कहा-
*"मैंने इसपार से जलती लंका की लपटेँ स्वयं देखी हैं। राक्षसों की चीख की पुकार भी सुनी थी। मैंने केमरे में सब रिकार्ड भी किया है। लो! देख लो।"*

दिशाहीन बन्दरों ने कहा-

*"यह तो होलीका प्रज्वलन की लपटेँ भी हो सकती हैं। बिना प्रमाण के हम नहीं मान सकते कि हनुमान ने लँका जलाई।"*
हनुमानजी ने कहा-
*"यह देखो! मेरा कोपीन अभी भी आग के ताप से तप्त है। जली लँका की राख अभी भी इसमें लगी हुई है।"*

लेकिन दिशाहीन बन्दर उछलकूद करते रहे, सबूत माँगते रहे।

उधर रावण ने जब यह सुना तो खुश हुआ। चलो अब राम पर हमारी जीत निश्चित है। उनके दल में हमारे भी लोग शामिल हैं।वे हनुमान आदि सेना का सबूत माँग कर मनोबल तोड़ रहे हैं।

_*समय बीतता गया।रावण मर गया। सीता वापस आ गई। राम अयोध्या की राजगद्दी पर बैठ गए पर वे उछलू बन्दर आज भी सबूत माँगते फिर रहे हैं।*

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