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षडयंत्र और फर्जी हस्ताक्षरों से निकाला अजय चौटाला को पार्टी से बाहर

Rajkumar Aggarwal

षडयंत्र और फर्जी हस्ताक्षरों से निकाला अजय चौटाला को पार्टी से बाहर

(राजकुमार अग्रवाल )
कैथल । विपक्ष के नेता अभय चौटाला आज पूरी तरह से बेनकाब हो गए और उन्होंने षड्यंत्र और फर्जी दस्तावेजों के सहारे अपने ही बड़े भाई और पार्टी महासचिव अजय चौटाला को पार्टी से बाहर निकालने की नापाक कार्रवाई को अंजाम दिया।
अभय चौटाला मीडिया के सामने तो परिवार में सुलह की बात करते हैं और कोई भी त्याग करने की बात करते हैं लेकिन हकीकत कुछ और ही है। 
वास्तव में अभय चौटाला परिवार में सुलह करने के बजाय पार्टी पर कब्जा करने के षडयंत्र लंबे समय से रच रहे हैं।
उन्होंने एक सोची समझी साजिश के तहत पहले सांसद दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला को पार्टी से बाहर किया और अब पार्टी महासचिव अजय चौटाला को असंवैधानिक तरीके से निष्कासित करने का काम किया है।
अभय चौटाला ने हाल ही में अपने बयान में कहा था कि पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल उनके बुजुर्ग हैं और परिवार में सुलह के लिए अगर वे उनसे कोई त्याग करने को कहेंगे तो वे इसके लिए तैयार रहेंगे। अभय सिंह चौटाला ने इस मामले में पूरी तरह से झूठ बोलने का काम किया ।
अभय चौटाला अपने भाई के परिवार के साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं थे। बादल परिवार के सदस्यों ने भी यह बताया है कि अभय चौटाला कोई समझौता नहीं करेंगे।
आज अजय चौटाला श्याम को सिरसा वापस जा रहे हैं। उनका रात या कल सुबह को प्रकाश सिंह बादल से लंबी फार्म हाउस पर मुलाकात करने का इरादा था। इस मुलाकात में अगर परिवार में जारी झगड़े को शांत करने के लिए कोई फार्मूला बनता तो अभय चौटाला के लिए उसे मानने की मजबूरी हो जाती।
इसलिए उन्होंने अजय चौटाला और प्रकाश सिंह बादल के मुलाकात होने से पहले ही अजय चौटाला को पार्टी से बाहर निकलवाने का काम कर दिया है।
अगर अभय चौटाला परिवार में समझौते के पक्षधर होते तो वे अजय चौटाला और प्रकाश सिंह बादल की मुलाकात के नतीजे का इंतजार जरूर करते लेकिन उन्होंने ऐसा करने की बजाय बड़े भाई को ही रास्ते से हटाने के काम को अंजाम दे दिया। 
उनकी इस कार्रवाई से यह साबित हो गया कि अभय चौटाला परिवार में सुलह नहीं चाहते थे और प्रकाश सिंह बादल की बात को मानने का उनका बयान पूरी तरह से झूठा था।

अभय रच रहे षड्यंत्र
अभय चौटाला पार्टी पर कब्जा करने के लिए पूरी तरह से बड़े षडयंत्र को अंजाम दे रहे हैं।
पिछले डेढ़ महीने में इनेलो की चार बैठकें आयोजित की गई हैं इन 4 बैठकों में से 2 में पार्टी प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला भी हाजिर थे । 
3 अक्टूबर और 18 अक्टूबर की बैठकों में पूरी तरह से गैर कानूनी काम को अंजाम दिया गया।
इन दोनों बैठकों में विधायकों और पदाधिकारियों से बैठक के एजेंडे पर साइन करने की बजाय सफेद कोरे कागजों पर बगैर तारीख के हस्ताक्षर कराए गए।
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी भी बैठक का एजेंडा तय होता है और हर प्रस्ताव के पास होने के साथ-साथ बैठक में शामिल लोगों के हस्ताक्षर कराए जाते हैं लेकिन 3 अक्टूबर और 18 अक्टूबर की बैठकों में इन नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए विधायकों को कोरे कागजों पर साइन करने को कहा गया।
इस मामले में अभय चौटाला ने अपने पिता ओमप्रकाश चौटाला को भी अंधेरे में रखते हुए धोखाधड़ी को अंजाम दिया।
इन बैठकों की कार्रवाई में पूरी तरह से अंधेरगरदी करते हुए मिनट नहीं बनाए गए और ना ही एजेंडा तय किया गया। अभय चौटाला ने पार्टी पदाधिकारियों और विधायकों के कोरे कागज पर साइन करा कर उन्हें साजिश के एजेंडे पर काम करने के लिए हासिल किया।

18 अक्टूबर के एजेंडे में दुष्यंत और दिग्विजय के मामले को लेकर अनुशासन तोड़ने का कोई एजेंडा पार्टी की बैठक का हिस्सा नहीं था लेकिन इसके बावजूद मनमाने तरीके से उनको निलंबित करने का फरमान जारी किया गया। विधायक से कोरे कागज पर साइन कराने की बात को शपथ लेकर पूछा जा सकता है।

ओम प्रकाश चौटाला ने नहीं किया अजय चौटाला को निष्कासित

फर्जी हस्ताक्षरं का इस्तेमाल किया गया

आज चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में अजय चौटाला को पार्टी से निकालने के लिए पार्टी प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला का जो पत्र जारी किया गया है । उस पर उनके असली हस्ताक्षर होने की बजाय डिजीटल हस्ताक्षारं का इस्तेमाल किया गया है। इसका मतलब यह है कि ओम प्रकाश चौटाला की सहमति के बगैर यह पत्र जारी किया गया है।
ओम प्रकाश चौटाला 12 तारीख को जुडिशल कस्टडी में थे और शाम को जेल में गए थे। 12 नवंबर को ओम प्रकाश चौटाला से किसी ने भी आधिकारिक तौर पर मुलाकात नहीं की।
अगर पार्टी का कोई नेता 12 तारीख को ओम प्रकाश चौटाला से नहीं मिला तो फिर उनकी ओर से निष्कासन का पत्र किसने जारी किया है ।
जेल के नियमों के अनुसार अंदर बंद किसी भी व्यक्ति का कोई भी डॉक्यूमेंट जेल सुप्रिटैंडेंट के चेक करने के बाद ही बाहर जाने दिया जाता है।
जब 12 तारीख को ओम प्रकाश चौटाला से कोई मिलने ही नहीं गया तो उनका पत्र किस तरह से जारी हो गया।
जाहिर सी बात है कि पत्र पर ओम प्रकाश चौटाला के साइन नहीं है और वह अभय चौटाला और अशोक अरोड़ा ने मिलकर खुद जारी किया है।

पार्टी संविधान के साथ कर रहे छेड़छाड़

अजय चौटाला द्वारा जींद में 17 नवंबर को बुलाई गई राज्य कार्यकारिणी की बैठक को अभय गुट अवैधानिक करार दे रहा है और यह कह रहा है कि उन्हें बैठक लेने का अधिकार ही नहीं है। मीडिया के बार-बार मांगे जाने के बावजूद अभय चौटाला और उनके साथी किसी को भी पार्टी का संविधान नहीं दिखा रहे हैं। असली बात यह है कि चुनाव आयोग में भी इनेलो का संविधान जमा नहीं कराया गया है।
इस बारे में चुनाव आयोग 17 फरवरी 2018 को नोटिस भी जारी कर चुका है कि जल्द से जल्द पार्टी का संविधान जमा करवाया जाए।
इनेलो पार्टी का संविधान बनाने वाले डॉक्टर केसी बांगड़ कल करनाल में यह कह चुके हैं कि राज्य महासचिव को राज्य कार्यकारिणी की बैठक बुलाने का पूरा अधिकार है जबकि इनेलो प्रवक्ता प्रवीण अत्रे ने पार्टी के संविधान की धाराएं बताते हुए यह बताया कि सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित व्यक्ति को ही बैठक बुलाने का अधिकार है।
असली बात यह है कि अभय चौटाला पार्टी के संविधान के साथ मनमाने तरीके से खिलवाड़ कर रहे हैं और अपनी सुविधा के अनुसार उसमें जोड़ तोड़ कर रहे हैं । यह पूरी तरह से गैरकानूनी है।
अगर उनके पास पार्टी का असली संविधान है तो उसे पार्टी की वेबसाइट पर क्यों नहीं डाला जाता है और क्यों नहीं बार-बार मांगने के बावजूद उसे चुनाव आयोग में जमा कराया जाता है । पार्टी सविधान के साथ मनमानी छेड़खानी करके ही अभय चौटाला पार्टी पर कब्जे की मुहिम चला रहे हैं ।
अजय चौटाला का निष्कासन अवैध है अजय चौटाला को पार्टी से गैरकानूनी तरीके से निकाला गया है।

-उनको कोई आरोप लगाने से पहले ही निष्कासन का पत्र जारी कर दिया गया है।
-न ही उनके ऊपर लगाए गए आरोपों के सबूत दिए गए।

- न ही अनुशासन समिति के पास उनका केस गया।

- न ही उनको कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
- ना ही उनको सुनवाई का कोई अधिकार दिया गया।

-अजय चौटाला पर सीधे अनुशासन तोड़ने के आरोप लगाकर पार्टी से निष्कासित किया गया जो किसी भी तरीके से सही नहीं है।

इससे साफ हो जाता है कि 17 तारीख की मीटिंग के डर से अजय चौटाला को अभय चौटाला ने उड़ा के साथ मिलकर गलत तरीके से पार्टी से निकालने का काम किया।
पार्टी महासचिव को इस तरह से निकाला नहीं जा सकता क्योंकि पार्टी महासचिव का पद बेहद अहम है और टिकटों की साइनिंग अथॉरिटी पार्टी महासचिव ही हैं । उनको राष्ट्रीय कार्यकारणी प्रॉपर तरीके की कार्रवाई के बाद ही दो तिहाई बहुमत के साथ हटा सकती है।
इस तरह एकतरफा कार्रवाई करके अजय चौटाला को पार्टी से नहीं निकाला जा सकता और ना ही पद से हटाया जा सकता है।
उनके निष्कासन को चुनाव आयोग में आसानी से चुनौती दी जा सकती है।

राजनीति में परिवारवाद की  बात यह है कि अजय चौटाला को सिर्फ इसी खौफ से पार्टी से निकाला गया है कि कहीं वह 17 नवंबर को जींद में आयोजित बैठक में अभय चौटाला के ग्रुप का तख्तापलट न कर दें और पार्टी में मौजूद जयचंदों को बाहर का रास्ता न दिखा दें। निष्कासन के पत्र पर पार्टी प्रमुख ओम प्रकाश चौटाला के असली हस्ताक्षरों की बजाय डिजिटल साइन होना भी यह बताता है कि उनसे मिले बगैर ही अभय चौटाला ने अशोक अरोड़ा के साथ मिलकर इस कार्रवाई को अपने फायदे के लिए अंजाम दिया है। पार्टी के संविधान को सार्वजनिक नहीं करना भी अभय चौटाला ग्रुप की मंशा ओं पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
चुनाव आयोग द्वारा संविधान जमा कराने के नोटिस जारी करने के 9 महीने बाद भी उसे जमा नहीं कराया जाना यह इशारा करता है कि अभय चौटाला ग्रुप पार्टी संविधान के साथ खिलवाड़ कर रहा है और अवैध तरीके से अपनी कार्रवाई को अंजाम दे रहा है।

पार्टी पर कब्जा करने के लिए हर गलत काम कर रहे अभय चौटाला अशोक अरोड़ा के साथ मिलकर अभी अपने मंसूबों में कामयाब होते जरूर नजर आ रहे हैं लेकिन चुनाव आयोग के पास यह मामला जाने के बाद उनके लिए लिए गए एक्शन को कानून सम्मत ठहराना किसी भी तरीके से मुमकिन नहीं हो पाएगा।

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